Tuesday, August 28, 2007

ये बदलते रिश्ते

बचपन में जब भी आस-पास बड़ों के बीच के रिश्तों पर गौर किया, तो हमेशा ये पाया कि जैसे-जैसे समय बीतता है, रिश्ते बहुत बदल जाते हैं। तबसे हमेशा ये सोचती थी कि मैं अपने जीवन में ऐसा नहीं होने दूँगी। जो लोग मेरे जीवन में महत्व रखते हैं, उनका महत्व हमेशा उतना ही रहेगा। बचपन में जो पहले रिश्ते हम खुद बनाते हैं वो हमारे दोस्त होते हैं। उस समय हमेशा ये सोचा कि उन दोस्तो से सदा वैसा ही सम्पर्क बनाए रखूँगी जैसे उन दिनों में था। फिर दूसरे देश आकर ये सोचा कि ये दूरी कि वजह से है कि सम्पर्क टूट गया। फिर नए दोस्त बनाए जिनके साथ २ साल और कुछ के साथ तो ६ साल पढ़ाई की। और अब जब पढ़ाई पूरी किये हुए १ साल से ज्यादा हो चुका है तब लगता है कि मेरे साथ भी कुछ वैसा ही हुआ है जो मैंने बचपन में अपने आस पास देखा था।

अब लगता है कि शायद मैं गलत थी। सिर्फ मुझपर नहीं है कि किसी रिश्ते की बुनियाद कितनी गहरी बनेगी और वो कितने दिन चलेगा। वो कहते हैं ना कि ताली कभी एक हाथ से नहीं बजती? इन ८ सालों में मैंने मुट्ठी भर ऐसे दोस्त बनाए हैं जिनके बारे में मैं गर्व से ये कह सकती हूँ कि वे जीवन के हर उतार-चढ़ाव में मेरा साथ देंगे। और कभी भी कोई विपदा आयी तो हमेशा, बिना दोबारा सोचे, मैं उनसे सहायता माँग सकती हूँ। लेकिन कुछ ऐसे भी लोग हैं जो एक समय बहुत प्रिय थे, और फिर कुछ ऐसा हुआ कि या तो हमारे रास्ते ही अलग हो गए या फिर अब कोई सम्पर्क ही नहीं रह गया।

जब से होस्टल से निकल सब अलग अलग जगह पर अपने घरों में रहने लगे हैं, किसी के पास दुसरे के लिए समय नहीं है। और सबकी यही शिक़ायत है कि कोई मिलता नहीं, ऊब जाते हैं, सिर्फ काम ही काम करते रहते हैं! लेकिन बहुत कम लोग हैं जो कुछ ऐसा करें कि सब एक जगह आयें और उनकी ये शिकायतें दूर हो जाएँ।

ऐसा लगता है कि सबकी प्राथमिकताएं बदल गयी हैं और हमारी जीवनशैली भी वैसी ही हो गयी है जैसे बचपन में ना होने देने का मैं खुद को दिलासा देती थी।

खैर, 'ये तो होना ही था' बोल के अगर इसे अनदेखा भी कर दिया जाये तो एक चीज़ इससे भी ज्यादा खटकती है। और वो ये कि जिन लोगों से बहुत ज्यादा अच्छी दोस्ती थी और जो बहुत दिनों से बहुत माइने रखते हैं, उनके साथ भी अब सिर्फ इसलिये जान पहचान रह गयी है क्यूंकि पहले थी। Its like, its for old times' sake, or because you've so gotten used to having that person around you that its like a piece of furniture at your place which you are too used to having around you! और जब ऐसा होता है तो ये बात बहुत खटकती है। जो एहसास उस संबंध में पहले था वो रह ही नहीं गया है। ऐसा लगता है कि दोनों ये सिर्फ इसलिये कर रहे हैं क्यूंकि हमेशा से करते आये हैं। और इससे ज्यादा अजीब तो कुछ भी नहीं हो सकता।

[I sincerely hope this doesn't happen with the guy I wud marry, lets see, we shall know when I find him! :D]

5 comments:

Unknown said...

Impressive...

Unknown said...

u really need some social life! :-p

Pri said...

what makes u think i dun have ne?! think u missed the whole point of the post, its not about social life its abt the relationships u hv wid da ppl arnd u!!

Unknown said...
This comment has been removed by the author.
Unknown said...

you made me nostalgic. Nice post though :-).